Sunday, 17 June 2012

*********up tet aur yuva ********

इसे मानव  का अभिशाप कहे  कि अपनी नियति की पराकाश्ठा कि " हम सदा जीने की सोचते है , कभी नहीं !"युवावो ने एक ऐसी सर्कार 
को  चुना जिससे इन्हें बड़ी उम्मीदे थी ,की भारत का सबसे युवा और पढ़ा लिखा ब्यक्ति हमारा सी एम्. है .....अब हमारे बुरे दिन कट गए !............ ऐसा कुछ नहीं था ,जिसको हमने इतनी उम्मीदों  चुना था , हमारा सबसे बड़ा दुश्मन बन बैठा ! दोष इनका भी नहीं ,..........यह तो राज निति  कीचाल  है .

...राजनीती की सबसे बड़ा वसूल येही है की सत्ता के बाद  हम राजा और  सब मुर्ख  प्रजा ... उस काली रात की स्याह चादरों में छटपटाता ये निरीह प्राणी एक आशा में की कब सूरज की पहली किरण की लालिमा अपना पट खोलेगी और हम अपना कल का दीदार क...र पायेगें!!!!!!
काश !ऐसा होता अब तो ऐसा लगने लगा है मानो कुछ लोगों का जीवन केवल काली रात की स्याह चादरों की जीवन संगिनी बनने के लिए अस्तित्व में आया था !                       
हे! ईश्वर पता 
नही इन टेट पास लोगों ने क्या बिगाड़ा था आप के साथ साथ सरकार भी हमारे धैर्य की इतनी कड़ी परीक्षा ले रही है !!!!!!!!!!!! 
लेकिन नहीं सायद आप ये भूल रहे की आम आदमी की ताकत क्या होती ? जिस दिन 

हम आस्तिकता और एक सभ्य नागरिक होने का ये चोला उतार फेकेगे उसी दिन 
हाहाकार मच जायेगा ! लोगों का धर्य टूट रहा है  अब और परखने की कोशिश मत  करो !                                               

 अब हम और चुप नहीं बैठेगे आने वाले 7 जुलाई 
को एक कदम और अपने अधिकार के लिए साथ  बढ़ने जा रहे है **क्युकी हमारे पास खोने के लिए कुछ  नहीं है ,सिवा अपनी बेरोजगारी के .पाने के लिए तो सारा समाज  हमारा है *****                                                                                                              







**आँधियाँ लाओ लहू मे ज्वार को पैदा करो..

कंठ मे क्रंदन नहीं,, हुंकार को पैदा करो ,...,

फिर कुरुक्षेत्री समर की भूमिका सजने लगी,,

पार्थ ! फिर गॉडीव में टंकार को पैदा करो !!!See More
Photo: मानव जीवन  का  ये कड़वा सच  कहे या झूठी दिलासा की "हम  सदा जीने की सोचते हैं ,जीते कभी नहीं !"उस  काली  रात की स्याह चादरों में छटपटाता ये निरीह प्राणी एक आशा में की कब सूरज की पहली किरण की  लालिमा  अपना पट खोलेगी  और हम अपना कल  का दीदार कर पायेगें!!!!!!काश !ऐसा होता  अब तो ऐसा लगने  लगा है मानो  कुछ लोगों का जीवन  केवल काली रात की स्याह चादरों की जीवन संगिनी बनने के लिए अस्तित्व में आया था ! हे ईश्वर पता नही इन  टेट पास  लोगों ने क्या बिगाड़ा था आप के साथ साथ  सरकार भी हमारे धैर्य  की इतनी  कड़ी  परीक्षा ले रही है !!!!!!!!!!!! लेकिन नहीं सायद आप ये भूल रहे  की  आम  आदमी की ताकत क्या होती ? जिस  दिन  हम  आस्तिकता और एक सभ्य नागरिक होने का ये चोला उतार फेकेगे उसी दिन  हाहाकार मच जायेगा ! लोगों का धर्य  टूट रहा है मत  अब और परखने की कोशिश करो .............................***********************आँधियाँ लाओ लहू मे ज्वार को पैदा करो..
कंठ मे क्रंदन नहीं,, हुंकार को पैदा करो ,...,
फिर कुरुक्षेत्री समर की भूमिका सजने लगी,,
पार्थ ! फिर गॉडीव में टंकार को पैदा करो !!!
      

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